Vitamin D is actually a HORMONE, not a vitamin! Dr. Uday Pote reveals how this miracle hormone prevents diabetes, cancer, depression & boosts immunity.
🔥 Key Points:
✅80% reduction in Type 1 diabetes risk (Finland study)
✅Cancer prevention mechanism explained
✅Why Indians are deficient despite abundant sunlight
✅Correct sun exposure for Indian skin
✅Supplement dosage guide
✅Kidney stone myth BUSTED
📊 Scientific Evidence:
✅ 31-year study with 10,800 children
✅ COVID-19 protection research (Egypt 2024)
✅ 12,600 patient depression study
⚠️ Important: Consult your doctor before starting supplements.
Dr. Uday Pote – Orthopedic & Spine Surgeon
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नमस्ते दोस्तों, मेरे हाथ में एक सुनहरे रंग की दवा है जो एक अमृत या एलिक्सियर से कम नहीं है। यह आपको तंदुरुस्त ही नहीं बल्कि कई बीमारियों जैसे कोविड, डायबिटीज, सोरियासिस और कैंसर होने से भी बचाती है। हां, यह असल में एक अमृत है। मैं हूं डॉक्टर उदय पोटे ऑर्थोपेडिक और स्पाइन सर्जन और स्वागत है स्पाइन टास्टिक्स में जहां हम हेल्थ, न्यूट्रिशन और लाइफस्टाइल के बारे में जानकारी देते हैं। [संगीत] और आज हम बात करने वाले हैं एक ऐसे इलेक्सियर या अमृत के बारे में जिसे गलत नाम भी दिया गया है और उसके बारे में काफी सारी गलतफहमियां भी फैलाई गई है और इस वीडियो के एंड में इस अमृत से जुड़ी सबसे बड़ी और कॉमन गलतफहमी मैं मिटाऊंगा और जिसे जानकर आप चौंक जाएंगे। असल में इसे हॉर्मोन बोला जाना चाहिए था लेकिन विटामिन का नाम दिया गया है। हां, मैं बात कर रहा हूं विटामिन डी के बारे में। एक हॉर्मोन यानी वो चीज जो शरीर खुद से बनाता है और खुद के इस्तेमाल के लिए और इसके कमी होने से या ना बनने से शरीर के सारे सिस्टम्स और ऑर्गन पे अफेक्ट होता है। हम सब जानते हैं थायरॉइड, टेस्टोस्टरॉन, ईस्ट्रोजन इन हॉर्मोंस के बारे में और इनके कमी होने से क्या प्रॉब्लम्स हो सकती है? विटामिन डी एक हार्मोन के सारे क्राइटेरिया पूरे करता है। यह स्किन में सनलाइट और यूवीबी रेज के प्रभाव से सिंथेसाइज होता है। यह लीवर और किडनीज में एंजाइमेटिक एक्टिवेशन से गुजरता है। जिससे यह कैल्सिटल 125 डाईहाइड्रोक्सी विटामिन डी बन जाता है जो दूर के ऑर्गन्स पे असर करता है। यह इंटेस्टाइन, बोन और किडनीज़ पर हॉर्मोन की तरह अफेक्ट करता है और कैल्शियम और फास्फेट मेटाबॉलिज्म को रेगुलेट करता है। ये न्यूक्लियर रिसेप्टर विडीआर से बाइंड करता है। जिससे टारगेट सेल्स पे जीन एक्सप्रेशन बदल जाता है। इसका मतलब यह कुछ शरीर के इंपॉर्टेंट सेल्स जैसे डब्ल्यूबीसी या सफेद पेशियों को एक्टिवेट करता है जिससे वो अपना काम इफेक्टिवली कर पाते हैं और इसका बहुत बड़ा फायदा मैं आगे बताऊंगा। अब जानते हैं कि इस इंपॉर्टेंट केमिकल का नाम गलत कैसे पड़ गया। सन 1920 को जब यूरोप में इंडस्ट्रियल रिवॉल्यूशन हुआ तब बच्चों में हड्डी कमजोर या सॉफ्ट पाई जाने लगी और इसकी वजह ढूंढते वक्त साइंटिस्ट को एक डाइटरी फैक्टर दिखा जिसकी कमी के कारण यह हड्डी कमजोर हो रही थी और उसी एसेंशियल न्यूट्रिएंट फैक्टर को विटामिन डी बोला गया क्योंकि वो डाइट में पाया गया था। उस वक्त डॉक्टर्स को मालूम नहीं था कि यह विटामिन डी शरीर खुद भी बना सकता है। लेकिन जब यह नाम पढ़ ही गया तो यह नाम रह गया और यहीं से शुरू हो जाता है विटामिन डी का अंडर रेटेड ट्रीटमेंट। अब हम 70 हजार साल पहले जाते हैं और जानते हैं कि हम सब अलग-अलग रंग के क्यों दिखते हैं और इससे हॉर्मोन डी का क्या ताल्लुक है। जब इंसान एक हंटर गैदर था तब वो घंटों तक सनलाइट में घूमा करता था। पहला इंसान अफ्रीका या पृथ्वी के इक्वेटर के पास पाया गया और वहां से वह माइग्रेट हुआ आज से करीब 70 हजार साल पहले नॉर्थ और साउथ में वो एक्सप्लोर करने के लिए निकला और वहीं पर स्थित हो गया। इस आदि मनुष्य की स्किन ब्राउन या ब्लैक थी क्योंकि शरीर में मेलेनिन यह पिगमेंट होता था जिससे सनलाइट के एडवर्स इफेक्ट से उसे बचाया जाता था। जैसे यह आदि मनुष्य इक्वेटर से दूर गया, उसे सनलाइट कम मिलने लगी और उसकी स्किन ने एडप्ट किया और मेलेनिन पिगमेंट कम कर दिया। मेलेनिन कम होने से उन लोगों की स्किन गोरी हो गई और गोरी स्किन कम सनलाइट एक्सपोज़र में जल्दी विटामिन डी बनाती थी। यह स्किन कलर चेंज सर्वाइवल के लिए बहुत ही जरूरी था और यह अप्टेशन होने में 300 से 400 साल लग गए थे। लेकिन आज एक गोरे चमड़ी का आदमी अफ्रीका या इक्वेटर के पास आधे घंटे में पहुंच जाता है। कम मेलानिन होने से अगर ज्यादा देर तक सन एक्सपोज़र रहता है तो स्किन कैंसर का खतरा होता है। इसलिए यह गोरी चमड़ी वालों ने इससे बचने के लिए बनाया सनस्क्रीन जो उनके लिए असरदार और फायदा करता है। लेकिन बिना इसके पीछे का साइंस या हिस्ट्री सोचे सभी लोगों ने सनस्क्रीन को हीरो और सनलाइट को विलेन बना दिया। वैसे ही एक ब्राउन चमड़ी का आदमी जब इक्वेटर से दूर चला जाता है तो वहां पे सनलाइट कम होती है और अगर यह बंदा गोरे लोगों जैसे सनस्क्रीन लगाएगा तो यह इंसान शिकार बन जाएगा हॉार्मोनल डेफिशिएंसी का और यही वजह है कि आज हम इक्वेटर के पास होके भी इस हॉर्मोन डेफिशिएंसी के शिकार बने हुए हैं और काफी सारे बीमारियों से तड़प रहे हैं। हमने पाश्चात्य कल्चर फॉलो और धूप से बचने के लिए खुद को पूरा ढकना भी शुरू कर दिया। सोचिए हमारी महिलाएं पहले साड़ी पहनती थी। यह साड़ी अलग-अलग प्रांतों में अलग थी। नॉर्थ की महिलाएं थोड़ी गोरी थी तो उनके कपड़े ज्यादा स्किन ढकने वाले थे और मध्य और साउथ इंडिया में सारी हाथ और पैरों को खुला रखती थी। यहां तक कि पुरुष भी धोती और गमचा पहना करते थे। लेकिन ब्रिटिश या पाश्चात्य कल्चर में शरीर को पूरा ढका रखने की आदत थी जो हमने भी स्वीकार कर ली। अभी स्वीकार कर ही लिया तो उसके साइड इफेक्ट्स भी स्वीकार करने होंगे। अब शायद यह हिस्ट्री सुनके काफी लोगों को यह सवाल का जवाब तो मिल गया होगा कि हम जब स्पेशली इंडियंस जो इंडिया में रहते हैं जहां धूप की कमी नहीं है तो भी हमें हार्मोन डी की डेफिशिएंसी क्यों है? तो चलिए यह देखते हैं कि हार्मोन डी शरीर में कहां-कहां उपयोग होता है। मैं डिटेल में बताऊंगा तो एक नहीं 50-10 मिनट की वीडियोस बनानी पड़ेगी। तो चलो मैं सिर्फ ब्रीफ में बताता हूं। आप जो कैल्शियम युक्त खाना या सप्लीमेंट खाते हो वो आपके डाइट से खून में जाना और खून से हड्डी, मसल और सारे शरीर तक पहुंचने का काम करता है यह हॉर्मोन डी। यानी अगर आप कैल्शियम खा भी रहे हो तो उसे काम करने के लिए हॉर्मोन डी की जरूरत होती है। बस एडल्ट्स ही नहीं बच्चों में भी हड्डी स्वस्थ और स्ट्रांग रखने के लिए इसकी जरूरत होती है। नहीं तो इन बच्चों में सॉफ्ट बोनस या रिकेट्स होने का खतरा होता है। मैंने स्टार्ट में कहा था कि हॉर्मोन डी न्यूक्लियर रिसेप्टर वीडीआर से बाइंड करता है। जिससे टारगेट सेल में जीन एक्सप्रेशन बदलता है। यह हॉर्मोन रिसेप्टर शरीर के वाइट ब्लड सेल्स में पाया जाता है। डब्ल्यूबीसी यानी सफेद पेशियां शरीर को इंफेक्शन और कैंसर जैसे बीमारियों से बचाता है। हॉर्मोन डी इन्हीं डब्ल्यूबीसी रिसेप्टर्स पर असर करके इन्हें एक्टिवेट करता है जिससे शरीर का इम्यून सिस्टम बना रहता है। कोविड-19 के लपेट में जब सारी दुनिया तड़प रही थी तब इजिप्ट में एक क्लीनिकल स्टडी की गई जो हाल ही में 2024 में पब्लिश की गई है और इसे पूरी दुनिया के विशेषज्ञों ने सराहने दी है। इस स्टडी में पाया गया है कि जिन पेशेंट्स में हॉर्मोन डी अच्छा था उन्हें कोविड-19 से माइल्ड ही परेशानी हुई है और वो पूरे रिकवर भी हुए। लेकिन जिनमें हॉर्मोन डी की कमी थी उन्हें कोविड-19 के सीवियर सिम्टम्स हुए। लेकिन जब ऐसे पीड़ित पेशेंट्स को एक्टिवेटेड हॉर्मोन डी यानी कैल्सिफिडियल दिया गया तो रिकवरी अच्छी हुई। तो आप कहेंगे कि क्यों बीमार होने पर हॉर्मोन डी नहीं लेते? यह जो रेगुलर हॉर्मोन डी होता है, यह शरीर में जाके एक्टिवेट होने में दो से तीन हफ्ते लगते हैं। और एक्टिवेटेड हॉर्मोन डी यानी कैल्सिफिडियल इंडियन मार्केट में फिलहाल अवेलेबल होने के लिए मुश्किल है। हॉर्मोन डी बस कोविड-19 के इफेक्ट्स ही नहीं लेकिन पोस्ट कोविड जो इम्यून स्टॉर्म होता है जिससे कई सारे जानी गई। यह उसे भी रेगुलेट करता है। यानी हॉर्मोन डी इम्यून सेल डिसरेगुलेशन को भी कंट्रोल करता है। तो बस कोविड-19 नहीं लेकिन यह हॉर्मोन डी काफी सारे दूसरे वायरल और बैक्टीरियल इंफेक्शन से भी हमें बचाता है। जैसे ट्यूबरकुलोसिस, निमोनिया इन सब से लड़ने में वह हमें मदद पहुंचाता है। अब पूरी दुनिया में ट्रायल्स हो रहे हैं। जहां कैल्सिफेडियल यह हार्मोन या एक्टिवेटेड विटामिन डी इंफेक्शन से पीड़ित लोगों में दिया जाने लगा है और इसके इफेक्ट स्टडी किए जाने लगे हैं। जैसे यह इम्यून डिसरेगुलेशन से बचाता है वैसा ही इसका फायदा ऑटोइ्यून डिजीजसेस जैसे सोरियासिस, अस्थमा, रुमेटॉइड अर्थराइटिस में भी देखा गया है। हॉर्मोन डी ज्वेनाइल डायबिटीज में भी मदद करता है। फिनलैंड में 1966 में एक स्टडी की गई है जिसमें 10,800 बच्चे जो एक साल के कम उम्र के थे और जिनमें टाइप वन डायबिटीज का रिस्क फैक्टर था उन्हें सिलेलेक्ट किया गया। उनमें से कुछ बच्चों को 2000 यूनिट्स हॉर्मोन डी हर दिन एक साल के लिए दिया गया और कुछ बच्चों को 400 इंटरनेशनल यूनिट्स और इन बच्चों को अगले 31 साल के लिए फॉलो किया गया। इसमें देखा गया कि जिन बच्चों को 2000 यूनिट्स हॉर्मोन डी दिया गया था उनमें टाइप वन डायबिटीज का रिस्क 80% से कम हुआ है उनके कंपैरिजन में जिनको विटामिन डी कम दिया गया यह एक फैंटास्टिक स्टडी है और वो भी 1966 में की गई है। हॉर्मोन डी इंसुलिन रेजिस्टेंस को भी कंट्रोल करता है ताकि टाइप टू डायबिटीज या कोई भी मेटाबॉलिक डिसऑर्डर या ओबेसिटी भी ना हो। लाखों और करोड़ों डॉलर्स के रिसर्च किए गए हैं ये डायबिटीज के ट्रीटमेंट के लिए। लेकिन इस सस्ते हार्मोन को इग्नोर कर दिया गया है। सन 2006 में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से अमेरिकन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ में एक एक्सीलेंट पेपर पब्लिश किया गया है। जिसमें हॉर्मोन डी लेवल्स और कोलोन यानी पेट के आतड़ी का कैंसर या ब्रेस्ट का कैंसर, प्रोस्टेट और ओवेरियन कैंसर जैसे खतरनाक कैंसर्स के रिलेशन को देखा गया है। इसमें ये देखा गया कि जिसमें हॉर्मोन डी लेवल्स अच्छे थे उनमें इन कैंसर्स की रिस्क काफी कम थी। हॉर्मोन डी ये कैसे करता है? हॉर्मोन डी अपोप्टोसिस यानी सेल डेथ को प्रमोट करता है ताकि एजेड सेल्स या खराब सेल्स नष्ट हो जाए। वह जींस को ऑन या ऑफ कर सकता है और वह कैंसर के ब्लड सप्लाई को भी रोक सकता है और मेटास्टेसिस होने या फैलने से उन्हें रोक सकता है। हार्मोन डीसाइटोकाइन रेगुलेशन या इनफ्लेममेटरी रेगुलेशन करता है जिससे ब्लड सप्लाई पहुंचाने वाले नलियों या धमनियों में क्लॉटिंग काफी कम हो जाता है। काफी सारे पेपर्स हैं जो हॉर्मोन डीफिशिएंसी और हार्ट प्रॉब्लम्स को डायरेक्टली लिंक करते हैं। हॉर्मोन डी आपका मूड भी रेगुलेट करता है। नवंबर 2011 के मेओक्निक प्रोसीडिंग्स में एक स्टडी पब्लिश की गई है। जिसमें यूएसए के कूपर क्लीनिक में 12,600 पेशेंट्स की स्टडी है। जिनमें हॉर्मोन डिडेफिशिएंसी और डिप्रेशन का डायरेक्ट लिंक देखा गया है। सोचने वाली बात है दोस्तों वेस्टर्न देशों में सबसे ज्यादा सुसाइड्स विंटर सीजंस या क्रिसमस के आसपास देखे गए हैं। जब वहां सनलाइट बहुत कम ही मात्रा में होती है। लेकिन इंडिया में सूरज की धूप कब कम पाई जाती है? रेनी सीजन में। इसी समय डिप्रेशन के केसेस बढ़ जाते हैं और हमारे मैक्सिमम फेस्टिवल्स श्रावण मास में और अर्ली विंटर्स में होती है ताकि इन फेस्टिवल्स की मदद से फैमिली साथ आ जाए और डिप्रेशन या अकेलेपन की प्रॉब्लम ना हो। हॉर्मोन डी ऊपर बताई बीमारियों से ही नहीं बल्कि डेंटल या दांतों की प्रॉब्लम, पेट की प्रॉब्लम, थायरॉइड, हाइपरटेंशन, ओबिसिटी जैसे और भी बीमारियों से हमें बचाता है। तो है कि नहीं? यह एक अमृत या इलेक्सियर। हॉर्मोन डी की कमी शुरुआत में बोन पेन, मसल पेन, पैरों में क्रैंप्स, मूव डिसऑर्डर जैसे सिम्टम्स दिखते हैं और लॉन्ग स्टैंडिंग डेफिशिएंसी से रिपीटेड इनफेक्शंस, डिप्रेशन, बैक पेन, नेक पेन और थकावट महसूस होना भी बढ़ जाता है। इसको टेस्ट करने के लिए सीरम विटामिन डी का ब्लड टेस्ट होता है। टोटल विटामिन डी लेवल देखना ज्यादा अच्छा है। इसका नॉर्मल रेंज होता है 30 से 100 नैनोग्राम पर ml। ऑप्टिमल लेवल्स होते हैं 40 और 60 के बीच। तो कहां मिलता है यह हॉर्मोन डी? इसके तीन मुख्य सोर्सेस होते हैं। पहला सन एक्सपोज़र, दूसरा डाइट और सप्लीमेंट। सूरज तो फ्री है लेकिन हमें टाइम नहीं है या हमें बोला गया है कि सन एक्सपोज़र से हजारों तकलीफें होती है लेकिन यह बस आधा सच है। पूरा सच यह है कि हां आपके चेहरे और गर्दन की स्किन पतली होती है जिसके कारण उसे सन एक्सपोज़र से प्रॉब्लम हो सकती है। तो सॉल्यूशन चेहरे और गर्दन को सनस्क्रीन लगाओ लेकिन हाथ और पैरों को तो खुले छोड़ दो। रिकमेंडेशन है जिनकी डार्क स्किन है उन्होंने एटलीस्ट आर्म्स और लेग्स बिलो नी सन में एक्सपोज रखें और वह भी 45 टू 60 मिनट्स के लिए 10 से तीन के बीच में ठंडी या रेनी सीजन में थोड़ा ज्यादा समय के लिए रखिए और समर्स में थोड़ा कम जिनकी स्किन फेयर हो या गोरी हो तो उन्होंने 10 से 15 मिनट ही सन एक्सपोज़र रखना चाहिए। जिनके फैमिली हिस्ट्री है स्किन कैंसर की उन्होंने सन एक्सपोज़र ना ही रखे और सप्लीमेंटेशन पे ध्यान रखें। जितनी उम्र ज्यादा उतनी हॉर्मोन डीप्रोडक्शन स्किन में कम होती है। तो उतने समय के लिए सन एक्सपोज़र ज्यादा रखना चाहिए। 1 साल से कम उम्र के बच्चों की स्किन नाजुक होती है तो उनके लिए सुबह का सन एक्सपोज़र 10 am के पहले भी काफी हो जाता है। याद रखिए क्लोथिंग, सनस्क्रीन, ग्लास या विंडोज़, यूवीबी रेज को रोकता है तो हमें डायरेक्ट सन एक्सपोज़र होना चाहिए। तो चलिए बात करते हैं डाइट के बारे में। डाइट बिल्कुल अच्छा सोर्स नहीं है हॉर्मोन डी के लिए। एक उदाहरण के तौर पे फैटी फिश जैसे 100 ग्राम सैलमन या रा मछली और मैक्र या बांगड़ा मछली में बस 350 यूनिट्स हॉर्मोन डी होता है। लेकिन यह फिश फ्राई करने पे इनके अंदर का हॉर्मोन डी नष्ट हो जाता है। दूध में तो बिल्कुल हॉर्मोन डी नहीं होता। उसे तो फर्टिफाई किया जाता है हॉर्मोन डी से और वह भी 100 यूनिट्स के ऊपर नहीं होता है। एक एग योग में 20 यूनिट हॉर्मोन डी होता है जो फ्राई करने पर पूरा नष्ट हो जाता है। तो आप खुद डिसाइड कर लीजिए और कितना खाना खाना है हॉर्मोन डी के लिए। अब बात करते हैं सप्लीमेंट्स की। सप्लीमेंट्स में कोले कैल्सिफेरोल फॉर्म विटामिन डी में मिलता है जो सबसे अच्छा फॉर्म होता है। कैल्सिटल फॉर्म में भी हॉर्मोन डी होता है। लेकिन इससे किडनी स्टोंस या हाइपरकल्समिया या खून में ज्यादा कैल्शियम होने का प्रॉब्लम दिख सकता है। इसलिए ज्यादा से ज्यादा हॉर्मोन डी सप्लीमेंट्स बस कोलेकल्सिफेरोल फॉर्म में ही होते हैं। लेकिन जो कैल्शियम टैबलेट के साथ थोड़ा सा कैल्सिटल होता है वह कॉम्बिनेशन सेफ होता है। तो कितना डोस हॉर्मोन डी या सप्लीमेंट का लेना चाहिए? 2 महीने से 10 साल के कम उम्र के बच्चों को 400 से 1000 यूनिट्स डेली मिलना चाहिए। 10 साल के आगे 1000 से 2000 यूनिट्स डेली और अगर आप ओबीस हो तो 2000 यूनिट्स नहीं तो 1000 या 2000 यूनिट्स के बीच में हॉर्मोन डी ले सकते हो। अगर ब्लड रिपोर्ट्स में डेफिशिएंसी होती है तो आपके डॉक्टर उस हिसाब से लोडिंग डोज़ देंगे जो लेना बेहद जरूरी होता है क्योंकि यह विटामिन डी फैट सॉलुबल होता है जो फैट में जमा होता है और जैसे जरूरत पड़ती है वहां से वह रिलीज होता है। तो जैसे मैंने शुरुआत में बोला था कि इस हॉर्मोन डी के बारे में एक सबसे बड़ी गलतफहमी है और मैं उस पर से पर्दाफाश करूंगा। तो सबसे बड़ी गलतफहमी और वह है क्या विटामिन डी से किडनी स्टोंस होते हैं और क्या यह विटामिन डी जमा हो के टॉक्सिसिटी पैदा करता है तो इसका जवाब है नहीं विटामिन डी अगर आप अकेले लेते हो तो कोई प्रॉब्लम नहीं है और अगर आप 4 से 5000 यूनिट से लेके 10,000 यूनिट डेली सेफली ले सकते हो। लेकिन अगर उसके साथ हाई डोस कैल्शियम लेंगे तो किडनी स्टोंस का प्रॉब्लम हो सकता है। इसलिए कैल्शियम सप्लीमेंट का डोज़ मिनिमम रखना चाहिए। और अगर आप किसी ट्रीटमेंट के लिए हाई डोज़ विटामिन डी और हाई डोज़ कैल्शियम ले रहे हो तो ब्लड कैल्शियम और यूरिन कैल्शियम दोनों के लेवल्स आपने चेक करने चाहिए। हॉर्मोन डिटॉक्सिसिटी बहुत ही रेयर होती है और 10 से 12,000 यूनिट्स डेली 8 महीनों तक लेने के बाद भी नहीं देखी गई। अपर लेवल यानी 100 नैनोग्राम पर ml के ऊपर के लेवल्स पर पोटेंशियल यानी संभावित रिस्क है। कंफर्म नहीं। इसके सिम्टम्स होते हैं मसल पेन, फटीग, कॉन्स्टिपेशन, न्यूरोलॉजिक प्रॉब्लम्स और कोमा की रिस्क भी हो सकती है। इसलिए अपनी डॉक्टर की सलाह लें और इस अमृत को सही तरीके से अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करिए। सेल्फ मेडिकेशन कोई भी चीज के लिए अवॉइड करें। आशा करता हूं कि आपको यह वीडियो जरूर इंटरेस्टिंग और इनेटिव लगी हो। अगर हां तो आपके दोस्तों और रिश्तेदारों में इसे जरूर शेयर करिए और कोई टॉपिक के बारे में आप मुझसे वीडियो बनवाना चाहते हो तो कमेंट में जरूर बताइए। तो मिलते हैं अगले वीडियो में। अपना ख्याल रखिए।